Brahma Kumaris Murli Hindi 18 August 2020

bk murli today

Posted by: BK Prerana

BK Prerana is executive editor at bkmurlis.net and covers daily updates from Brahma Kumaris Spiritual University. Prerana updates murlis in English and Hindi everyday.
Twitter: @bkprerana | Facebook: @bkkumarisprerana
Share:






    Brahma Kumaris Murli Hindi 18 August 2020

    Brahma Kumaris Murli Hindi 18 August 2020

    Brahma Kumaris Murli Hindi 18 August 2020


    18-08-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन

    “मीठे बच्चे - अपनी सतोप्रधान तकदीर बनाने के लिए याद में रहने का खूब पुरूषार्थ करो, सदा याद रहे मैं आत्मा हूँ, बाप से पूरा वर्सा लेना है''

    प्रश्नः- 

    बच्चों को याद का चार्ट रखना मुश्किल क्यों लगता है?

    उत्तर:- 

    क्योंकि कई बच्चे याद को यथार्थ समझते ही नहीं हैं। बैठते हैं याद में और बुद्धि बाहर भटकती है। शान्त नहीं होती। वह फिर वायुमण्डल को खराब करते हैं। याद करते ही नहीं तो चार्ट फिर कैसे लिखें। अगर कोई झूठ लिखते हैं तो बहुत दण्ड पड़ जाता है। सच्चे बाप को सच बताना पड़े।

    गीत:- 

    तकदीर जगाकर आई हूँ........ 

    ओम् शान्ति। 

    रूहानी बच्चों को फिर भी रूहानी बाप रोज़-रोज़ समझाते हैं कि जितना हो सके देही-अभिमानी बनो। अपने को आत्मा निश्चय करो और बाप को याद करो क्योंकि तुम जानते हो हम उस बेहद के बाप से बेहद सुख की तकदीर बनाने आये हैं। तो जरूर बाप को याद करना पड़े। पवित्र सतोप्रधान बनने बिगर सतोप्रधान तकदीर बना नहीं सकते। यह तो अच्छी रीति याद करो। मूल बात है ही एक। यह तो अपने पास लिख दो। बांह पर नाम लिखते हैं ना। तुम भी लिख दो - हम आत्मा हैं, बेहद के बाप से हम वर्सा ले रहे हैं क्योंकि माया भुला देती है इसलिए लिखा हुआ होगा तो घड़ी-घड़ी याद रहेगी। मनुष्य ओम् का वा कृष्ण आदि का चित्र भी लगाते हैं याद के लिए। यह तो है नये ते नई याद। यह सिर्फ बेहद का बाप ही समझाते हैं। इस समझने से तुम सौभाग्यशाली तो क्या पदम भाग्यशाली बनते हो। बाप को न जानने कारण, याद न करने कारण कंगाल बन गये हैं। एक ही बाप है जो सदैव के लिए जीवन को सुखी बनाने आये हैं। भल याद भी करते हैं परन्तु जानते बिल्कुल नहीं हैं। विलायत वाले भी सर्वव्यापी कहना भारत-वासियों से सीखे हैं। भारत गिरा है, तो सब गिरे हैं। भारत ही रेसपान्सिबुल है अपने को गिराने और सबको गिराने। बाप कहते हैं मैं भी यहाँ ही आकर भारत को स्वर्ग सचखण्ड बनाता हूँ। ऐसा स्वर्ग बनाने वाले की कितनी ग्लानि कर दी है। भूल गये हैं इसलिए लिखा हुआ है यदा यदाहि..... इनका भी अर्थ बाप ही आकर समझाते हैं। बलिहारी एक बाप की है। अभी तुम जानते हो बाप आते हैं जरूर, शिवजयन्ती मनाते हैं। परन्तु शिवजयन्ती का कदर बिल्कुल नहीं है। अभी तुम बच्चे समझते हो जरूर होकर गये हैं, जिसकी जयन्ती मनाते हैं। सतयुगी आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना वही करते हैं। और सब जानते हैं कि हमारा धर्म फलाने ने फलाने समय स्थापन किया। उनके पहले है ही देवी-देवता धर्म। उनको बिल्कुल ही नहीं जानते कि यह धर्म कहाँ गुम हो गया। अभी बाप आकर समझाते हैं - बाप ही सबसे ऊंच है, और किसकी महिमा है नहीं। धर्म स्थापक की महिमा क्या होगी। बाप ही पावन दुनिया की स्थापना और पतित दुनिया का विनाश कराते हैं और तुमको माया पर जीत पहनाते हैं। यह बेहद की बात है। रावण का राज्य सारी बेहद की दुनिया पर है। हद के लंका आदि की बात नहीं। यह हार-जीत की कहानी भी सारे भारत की ही है। बाकी तो बाईप्लाट हैं। भारत में ही डबल सिरताज और सिंगल ताज राजायें बनते हैं और जो भी बड़े-बड़े बादशाह होकर गये हैं, कोई पर भी लाइट का ताज नहीं होता है सिवाए देवी-देवताओं के। देवतायें तो फिर भी स्वर्ग के मालिक थे ना। अब शिवबाबा को कहा ही जाता है परमपिता, पतित-पावन। इनको लाइट कहाँ देंगे। लाइट तब दें जब बिगर लाइट वाला पतित भी हो। वह कभी बिगर लाइट वाला होता ही नहीं। बिन्दी पर लाइट दे कैसे सकेंगे। हो न सके। दिन-प्रतिदिन तुमको बहुत गुह्य-गुह्य बातें समझाते रहते हैं, जो जितना बुद्धि में बिठा सके। मुख्य है ही याद की यात्रा। इसमें माया के विघ्न बहुत पड़ते हैं। भल कोई याद के चार्ट में 50-60 परसेन्ट भी लिखते हैं परन्तु समझते नहीं हैं कि याद की यात्रा किसको कहा जाता है। पूछते रहते हैं - इस बात को याद कहें? बड़ा मुश्किल है। तुम यहाँ 10-15 मिनट बैठते हो, उनमें भी जांच करो - याद में अच्छी रीति रहते हैं? बहुत हैं जो याद में रह नहीं सकते फिर वह वायुमण्डल को खराब कर देते हैं। बहुत हैं जो याद में न रहने से विघ्न डालते हैं। सारा दिन बुद्धि बाहर भटकती रहती है। सो यहाँ थोड़ेही शान्त होगी, इसलिए याद का चार्ट भी रखते नहीं। झूठा लिखने से तो और ही दण्ड पड़े। बहुत बच्चे भूलें करते हैं, छिपाते हैं। सच बताते नहीं। बाप कहे और सच न बताये तो कितना दोष हो जाता। कितना भी बड़ा गन्दा काम किया होगा तो भी सच बताने में लज्जा आयेगी। अक्सर करके सब झूठ बतायेंगे। झूठी माया, झूठी काया...... है ना। एकदम देह-अभिमान में आ जाते हैं। सच सुनाना तो अच्छा ही है और भी सीखेंगे। यहाँ सच बताना है। नॉलेज के साथ-साथ याद की यात्रा भी जरूरी है क्योंकि याद की यात्रा से ही अपना और विश्व का कल्याण होना है। नॉलेज समझाने के लिए बहुत सहज है। याद में ही मेहनत है। बाकी बीज से झाड़ कैसे निकलता है, वह तो सबको मालूम रहता है। बुद्धि में 84 का चक्र है, बीज और झाड़ की नॉलेज होगी ना। बाप तो सत्य है, चैतन्य है, ज्ञान का सागर है। उनमें नॉलेज है समझाने के लिए। यह है बिल्कुल अनकॉमन बात। यह मनुष्य सृष्टि का झाड़ है। यह भी कोई नहीं जानते। सब नेती-नेती करते गये। ड्युरेशन को ही नहीं जानते तो बाकी क्या जानेंगे। तुम्हारे में भी बहुत थोड़े हैं जो अच्छी रीति जानते हैं, इसलिए सेमीनार भी बुलाते हैं। अपनी-अपनी राय दो। राय तो कोई भी दे सकते हैं। ऐसे नहीं कि जिनके नाम हैं उनको ही देनी है। हमारा नाम नहीं है, हम कैसे देवें। नहीं, कोई को भी सर्विस अर्थ कोई राय हो, एडवाइज़ हो लिख सकते हो। बाप कहते हैं कोई भी राय आये तो लिखना चाहिए। बाबा इस युक्ति से सर्विस बहुत बढ़ सकती है। कोई भी राय दे सकते हैं। देखेंगे किस-किस प्रकार की राय दी है। बाबा तो कहते रहते हैं - किस युक्ति से हम भारत का कल्याण करें, सबको पैगाम देवें। आपस में विचार निकालो, लिखकर भेजो। माया ने सबको सुला दिया है। बाप आते ही हैं जब मौत सामने होता है। अब बाप कहते हैं सबकी वानप्रस्थ अवस्था है, पढ़ो न पढ़ो, मरना जरूर है। तैयारी करो न करो, नई दुनिया जरूर स्थापन होनी है। अच्छे-अच्छे बच्चे जो हैं वह अपनी तैयारी कर रहे हैं। सुदामा का भी मिसाल गाया हुआ है - चावल मुट्ठी ले आया। बाबा हमको भी महल मिलने चाहिए। है ही उनके पास चावल मुट्ठी तो क्या करेंगे। बाबा ने मम्मा का मिसाल बताया है - चावल मुट्ठी भी नहीं ले आई। फिर कितना ऊंच पद पा लिया, इसमें पैसे की बात नहीं है। याद में रहना है और आप समान बनाना है। बाबा की तो कोई फी आदि नहीं। समझते हैं हमारे पास पैसे पड़े हैं तो क्यों न यज्ञ में स्वाहा कर दें। विनाश तो होना ही है। सब व्यर्थ हो जायेगा। इससे कुछ तो सफल करें। हर एक मनुष्य कुछ न कुछ दान-पुण्य आदि जरूर करते हैं। वह है पाप आत्माओं का पाप आत्माओं को दान-पुण्य। फिर भी उसका अल्पकाल के लिए फल मिल जाता है। समझो कोई युनिवर्सिटी, कॉलेज आदि बनाते हैं, पैसे जास्ती हैं, धर्मशाला आदि बना देते हैं तो उनको मकान आदि अच्छा मिल जायेगा। परन्तु फिर भी बीमारी आदि तो होगी ना। समझो किसने हॉस्पिटल आदि बनाई होगी तो करके तन्दुरूस्ती अच्छी रहेगी। परन्तु उनसे सब कामनायें तो सिद्ध नहीं होती हैं। यहाँ तो बेहद के बाप द्वारा तुम्हारी सब कामनायें पूरी हो जाती हैं।

    तुम बनते हो पावन तो सब पैसे विश्व को पावन बनाने में लगाना अच्छा है ना। मुक्ति-जीवनमुक्ति देते हो सो भी आधाकल्प के लिए। सब कहते हैं हमको शान्ति कैसे मिले। वह तो शान्तिधाम में मिलती है और सतयुग में एक धर्म होने कारण वहाँ अशान्ति होती नहीं। अशान्ति होती है रावण राज्य में। गायन भी है ना - राम राजा राम प्रजा...... वह है अमरलोक। वहाँ अमरलोक में मरने का अक्षर होता नहीं। यहाँ तो बैठे-बैठे अचानक मर जाते हैं, इसको मृत्युलोक उसको अमरलोक कहा जाता है। वहाँ मरना होता नहीं। पुराना एक शरीर छोड़ फिर बालक बन जाते हैं। रोग होता नहीं। कितना फायदा होता है। श्री श्री की मत पर तुम एवरहेल्दी बनते हो। तो ऐसे रूहानी सेन्टर्स कितने खुलने चाहिए। थोड़े भी आते हैं वह कम है क्या। इस समय कोई भी मनुष्य ड्रामा के ड्युरेशन को नहीं जानते हैं। पूछेंगे तुमको फिर यह किसने सिखलाया है। अरे, हमको बताने वाला बाप है। इतने ढेर बी.के. हैं। तुम भी बी.के. हो। शिवबाबा के बच्चे हो। प्रजापिता ब्रह्मा के भी बच्चे हो। यह है ह्युमैनिटी का ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। इनसे हम बी.के. निकले हैं। बिरादरियाँ होती हैं ना। तुम्हारे देवी-देवताओं का कुल बहुत सुख देने वाला है। यहाँ तुम उत्तम बनते हो फिर वहाँ राज्य करते हो। यह किसको बुद्धि में रह न सके। यह भी बच्चों को समझाया है देवताओं के पैर इस तमोप्रधान दुनिया में पड़ न सके। जड़ चित्र का परछाया पड़ सकता है, चैतन्य का नहीं पड़ सकता। तो बाप समझाते हैं - बच्चे, एक तो याद की यात्रा में रहो, कोई भी विकर्म न करो और सर्विस की युक्तियाँ निकालो। बच्चे कहते हैं - बाबा, हम तो लक्ष्मी-नारायण जैसा बनेंगे। बाबा कहते तुम्हारे मुख में गुलाब लेकिन इसके लिए मेहनत भी करनी है। ऊंच पद पाना है तो आप समान बनाने की सेवा करो। तुम एक दिन देखेंगे - एक-एक पण्डा अपने साथ 100-200 यात्री भी ले आयेंगे। आगे चल देखते रहेंगे। पहले से थोड़ेही कुछ कह सकते हैं। जो होता रहेगा सो देखते रहेंगे।

    यह बेहद का ड्रामा है। तुम्हारा है सबसे मुख्य पार्ट बाप के साथ, जो तुम पुरानी दुनिया को नई बनाते हो। यह है पुरूषोत्तम संगम युग। अब तुम सुखधाम के मालिक बनते हो। वहाँ दु:ख का नाम-निशान नहीं होगा। बाप है ही दु:ख हर्ता, सुख कर्ता। दु:ख से आकर लिबरेट करते हैं। भारतवासी फिर समझते हैं इतना धन है, बड़े-बड़े महल है, बिजलियाँ हैं, बस यही स्वर्ग है। यह सब है माया का पाम्प। सुख के लिए साधन बहुत करते हैं। बड़े-बड़े महल मकान बनाते हैं फिर मौत कैसे अचानक हो जाता है, वहाँ मरने का डर नहीं। यहाँ तो अचानक मर जाते हैं फिर कितना शोक करते हैं। फिर समाधि पर जाकर आंसू बहाते हैं। हर एक की अपनी-अपनी रसमरिवाज है। अनेक मत हैं। सतयुग में ऐसी बात होती नहीं। वहाँ तो एक शरीर छोड़ दूसरा ले लेते हैं। तो तुम कितना सुख में जाते हो। उसके लिए कितना पुरूषार्थ करना चाहिए। कदम-कदम पर मत लेनी चाहिए। गुरू की वा पति की मत लेते हैं वा तो अपनी मत से चलना होता है। आसुरी मत क्या काम देंगी। आसुरी तरफ ही ढकेलेगी। अब तुमको मिलती है ईश्वरीय मत, ऊंच ते ऊंच इसलिए गाया हुआ भी है - श्रीमत भगवानुवाच। तुम बच्चे श्रीमत से सारे विश्व को हेविन बनाते हो। उस हेविन के तुम मालिक बनते हो इसलिए तुम्हें हर कदम पर श्रीमत लेनी है परन्तु किसकी तकदीर में नहीं है तो फिर मत पर चलते नहीं हैं। बाबा ने समझाया है किसको भी अपना कुछ अक्ल हो, राय हो तो बाबा को भेज देवें। बाबा जानते हैं कौन-कौन राय देने लायक हैं। नये-नये बच्चे निकलते रहते हैं। बाबा तो जानते हैं ना कौन से अच्छे-अच्छे बच्चे हैं। दुकानदारों को भी राय निकालनी चाहिए - ऐसे यत्न करें जो बाप का परिचय मिले। दुकान में भी सबको याद कराते रहें। भारत में जब सतयुग था तो एक धर्म था। इसमें नाराज़ होने की तो बात ही नहीं। सबका एक बाप है। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो जाएं। स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे। अच्छा!

    मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

    धारणा के लिए मुख्य सार:-


    1) श्रीमत पर चलकर सारे विश्व को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है, बहुतों को आप समान बनाना है। आसुरी मत से अपनी सम्भाल करनी है।

    2) याद की मेहनत से आत्मा को सतोप्रधान बनाना है। सुदामा मिसल जो भी चावल मुट्ठी हैं वह सब सफल कर अपनी सर्व कामनायें सिद्ध करनी है।

    वरदान:- 

    परीक्षाओं और समस्याओं में मुरझाने के बजाए मनोरंजन का अनुभव करने वाले सदा विजयी भव

    इस पुरूषार्थी जीवन में ड्रामा अनुसार समस्यायें व परिस्थितियां तो आनी ही हैं। जन्म लेते ही आगे बढ़ने का लक्ष्य रखना अर्थात् परीक्षाओं और समस्याओं का आह्वान करना। जब रास्ता तय करना है तो रास्ते के नजारे न हों यह हो कैसे सकता। लेकिन उन नजारों को पार करने के बजाए यदि करेक्शन करने लग जाते हो तो बाप की याद का कनेक्शन लूज हो जाता है और मनोरंजन के बजाए मन को मुरझा देते हो। इसलिए वाह नजारा वाह के गीत गाते आगे बढ़ो अर्थात् सदा विजयी भव के वरदानी बनो।

    स्लोगन:- 

    मर्यादा के अन्दर चलना माना मर्यादा पुरूषोत्तम बनना।


    ***Om Shanti***

    Brahma Kumaris Murli Hindi 18 August 2020

    No comments